"लिट्टी-चोखा'' आहा नाम सुनते ही आपके मुँह मेँ पानी आ जाय पर मेरी तो आँखोँ मेँ पानी भर आता है।मुँह तो मैँ आज भी इसके लिए बाये रहता हुँ।एक अनोखी भावुकता है लिट्टी के साथ। लिट्टी युपी बिहार का स्वादिष्ट ही नही अपितु आम साधारण लोगो का शाही फूड था ये।इसकी लोकप्रियता का कारण केवल इसका स्वाद नही था बल्कि इसके बनने मेँ इसकी कम लागत, कम समय, बिना किसी बर्तन और तामझाम के बनने और गरीब, किसानो, कामगारोँ के पेट की आग को दिन दिन भर बुझाये रखने की अद्भुत योग्यता से था जिसने इसे "जनभोजन" का दर्जा दिला दिया था। लिट्टी केवल एक type of desi food नही था बल्कि यह एक पुरा मैकेनिज्म है जो किसानोँ कामगारो और साधारण आम लोगोँ के भुख तंत्र से जुङा है।एक तो इसके बनने मेँ बस आटा और सत्तु चाहिए।बस सत्तु को भी कुछ नहीँ करना,उसमेँ तनी नमक डाला,कच्चा सरसोँ तेल,हरिहर मिर्चा का टुकड़ा,कच्चा लहसुन,नीँबु निचोड़ा, अजवायन और तनी अँचार का मसाला,सब डाल एकदम रगड़ के मिला दिये।एकदम लहरदार चटक सत्तु मसाला तैयार।अब आटा साना सत्तु डाला और बङका गोला बनाया और कहीँ भी गोयठा कंडा की भौरी जलाई और सेँक लिया।मिल के चार लिट्टी खाई और चल दिए देश खाने वालोँ के यहाँ पानी पी पी के मजदुरी करने। जी लिट्टी विज्ञान कहता है लिट्टी खा के पानी पीते रहने से वो अंदर फुलता है और भुख नही लगती,पेट भरा महसुस होता है।इतना चमत्कारी और गरीबोँ कि सँजीवनी हुआ करता था ये लिट्टी। गाँव देहात के लोगोँ के लिए खाद्य सुरक्षा का प्रतीक था ये लिट्टी।इतना ही नहीँ,भले इसे बनाने मेँ संसाधन कम लगते होँ पर जो भी संसाधन लगते थे वो बिना सब के मिले कहाँ से जुटते।केवल भोजन नहीँ बल्कि लिट्टी तो खुद आग पर जल समाज को जोड़ने वाला फेवीकोल था। बिरजु जा के अपने गोहाल से गोयठा उठा लाया,तो लखंदर आटा सान रहा है,ताजा लहसुन मिर्चा के लिये दौड़ के हरिया अपनी बाड़ी से तोड़ आया,इधर गणेशर गोला बाँध रहा है तो उधर बजरंगी आग पर हल्का हल्का सेँक रहे हैँ।जब तक लिट्टी सेँका रहा है सब छिरिया के बैठे हैँ बोरा बिझाये,गाँव का किस्सा "अहो सुने कल गौरी मंडल के मुर्गा मार के कउन तो खा गया और बदमाशी देखिये कि खाय के पंखी द्वार पर टांग गया"।तब तक गंभीर टॉपिक पर चर्चा उठ जाती "ई साला सुने बिजली SDO फेर लौटा दिया,कहा ट्राँसफरमर हईए नही है अभी,बताईये तीन महीना से अँधार मेँ हैँ,साला 5000 तो खिला चुके चंदा उठाय के बिजली ऑफिस को,बहुत आफत है गुरू"।ऐसी और ना जाने कितनी बातेँ। जी हाँ ऐसा होता था लिट्टी,ये अंदर पेट को गर्मी देता था बाहर रिश्तोँ को,चर्चाओँ को गर्मी देता है। ये हमारा इतना अपना था कि आज मन भावुक हो उठता है इसे खुद से दुर और पराया होता देख। आज शहर मेँ जब इसे लिट्टी से लिट्टीज बनते देखा तो आँख भर आई।85 रुपये मेँ 2 पीस मिलने लगा है ये। कहाँ तो हमरे गाँव का लिट्टिया एकदम बदल गया है यहाँ आ के। हमे देख मुँह फेर लेता है। मैँने उससे कहा भी कि शहर आ के तेरी कीमत बढी है पर कद छोटा भी हुआ है। हमारे यहाँ तु लिट्टी का गोला था यहाँ छोटी सी लिट्टीज की गोली हो गया है।पर वो खुश है यहाँ। कहा "अमीरोँ की सँगत मेँ अब मेरा लिट्टीलाईजेशन हो गया है,इसमेँ कद और गुणवत्ता घटती है पर कीमत बढ़ जाती है"। कहा अब यहाँ भी लोग खाते कम और बचाने ज्यादा लगे हैँ तभी तो यहाँ भी हिट हुँ।मगर लिट्टी नही जानता यहाँ लोग उसे चम्मच से खाते हैँ हम उसे मन से खाते थे।जब एक साहब को मैँने लिट्टी की पेट काँटा चम्मच भोँकते देखा तो लगा जैसे बचपन के साथी को खुखरी गँथा दी किसी ने,दिल दहल गया। कुछ भी हो पर हाँ चलिये आज जब लिट्टी को मालपुआ और पनीर टिक्का और दाल बाटी चुरमा के साथ कतार मे सजा हुआ देखता हुँ तो सँतोष मिलता है कि अपना लिट्टी बङी औकात वाला हो गया। वो आज भी मेरा उतना ही लगता है जितना पहले।:-) जय हो।Come and see a village from my eyes and you will feel no difference between your village and my village or any other Indian village.
Monday, November 10, 2014
लिट्टीलाइजेसन
"लिट्टी-चोखा'' आहा नाम सुनते ही आपके मुँह मेँ पानी आ जाय पर मेरी तो आँखोँ मेँ पानी भर आता है।मुँह तो मैँ आज भी इसके लिए बाये रहता हुँ।एक अनोखी भावुकता है लिट्टी के साथ। लिट्टी युपी बिहार का स्वादिष्ट ही नही अपितु आम साधारण लोगो का शाही फूड था ये।इसकी लोकप्रियता का कारण केवल इसका स्वाद नही था बल्कि इसके बनने मेँ इसकी कम लागत, कम समय, बिना किसी बर्तन और तामझाम के बनने और गरीब, किसानो, कामगारोँ के पेट की आग को दिन दिन भर बुझाये रखने की अद्भुत योग्यता से था जिसने इसे "जनभोजन" का दर्जा दिला दिया था। लिट्टी केवल एक type of desi food नही था बल्कि यह एक पुरा मैकेनिज्म है जो किसानोँ कामगारो और साधारण आम लोगोँ के भुख तंत्र से जुङा है।एक तो इसके बनने मेँ बस आटा और सत्तु चाहिए।बस सत्तु को भी कुछ नहीँ करना,उसमेँ तनी नमक डाला,कच्चा सरसोँ तेल,हरिहर मिर्चा का टुकड़ा,कच्चा लहसुन,नीँबु निचोड़ा, अजवायन और तनी अँचार का मसाला,सब डाल एकदम रगड़ के मिला दिये।एकदम लहरदार चटक सत्तु मसाला तैयार।अब आटा साना सत्तु डाला और बङका गोला बनाया और कहीँ भी गोयठा कंडा की भौरी जलाई और सेँक लिया।मिल के चार लिट्टी खाई और चल दिए देश खाने वालोँ के यहाँ पानी पी पी के मजदुरी करने। जी लिट्टी विज्ञान कहता है लिट्टी खा के पानी पीते रहने से वो अंदर फुलता है और भुख नही लगती,पेट भरा महसुस होता है।इतना चमत्कारी और गरीबोँ कि सँजीवनी हुआ करता था ये लिट्टी। गाँव देहात के लोगोँ के लिए खाद्य सुरक्षा का प्रतीक था ये लिट्टी।इतना ही नहीँ,भले इसे बनाने मेँ संसाधन कम लगते होँ पर जो भी संसाधन लगते थे वो बिना सब के मिले कहाँ से जुटते।केवल भोजन नहीँ बल्कि लिट्टी तो खुद आग पर जल समाज को जोड़ने वाला फेवीकोल था। बिरजु जा के अपने गोहाल से गोयठा उठा लाया,तो लखंदर आटा सान रहा है,ताजा लहसुन मिर्चा के लिये दौड़ के हरिया अपनी बाड़ी से तोड़ आया,इधर गणेशर गोला बाँध रहा है तो उधर बजरंगी आग पर हल्का हल्का सेँक रहे हैँ।जब तक लिट्टी सेँका रहा है सब छिरिया के बैठे हैँ बोरा बिझाये,गाँव का किस्सा "अहो सुने कल गौरी मंडल के मुर्गा मार के कउन तो खा गया और बदमाशी देखिये कि खाय के पंखी द्वार पर टांग गया"।तब तक गंभीर टॉपिक पर चर्चा उठ जाती "ई साला सुने बिजली SDO फेर लौटा दिया,कहा ट्राँसफरमर हईए नही है अभी,बताईये तीन महीना से अँधार मेँ हैँ,साला 5000 तो खिला चुके चंदा उठाय के बिजली ऑफिस को,बहुत आफत है गुरू"।ऐसी और ना जाने कितनी बातेँ। जी हाँ ऐसा होता था लिट्टी,ये अंदर पेट को गर्मी देता था बाहर रिश्तोँ को,चर्चाओँ को गर्मी देता है। ये हमारा इतना अपना था कि आज मन भावुक हो उठता है इसे खुद से दुर और पराया होता देख। आज शहर मेँ जब इसे लिट्टी से लिट्टीज बनते देखा तो आँख भर आई।85 रुपये मेँ 2 पीस मिलने लगा है ये। कहाँ तो हमरे गाँव का लिट्टिया एकदम बदल गया है यहाँ आ के। हमे देख मुँह फेर लेता है। मैँने उससे कहा भी कि शहर आ के तेरी कीमत बढी है पर कद छोटा भी हुआ है। हमारे यहाँ तु लिट्टी का गोला था यहाँ छोटी सी लिट्टीज की गोली हो गया है।पर वो खुश है यहाँ। कहा "अमीरोँ की सँगत मेँ अब मेरा लिट्टीलाईजेशन हो गया है,इसमेँ कद और गुणवत्ता घटती है पर कीमत बढ़ जाती है"। कहा अब यहाँ भी लोग खाते कम और बचाने ज्यादा लगे हैँ तभी तो यहाँ भी हिट हुँ।मगर लिट्टी नही जानता यहाँ लोग उसे चम्मच से खाते हैँ हम उसे मन से खाते थे।जब एक साहब को मैँने लिट्टी की पेट काँटा चम्मच भोँकते देखा तो लगा जैसे बचपन के साथी को खुखरी गँथा दी किसी ने,दिल दहल गया। कुछ भी हो पर हाँ चलिये आज जब लिट्टी को मालपुआ और पनीर टिक्का और दाल बाटी चुरमा के साथ कतार मे सजा हुआ देखता हुँ तो सँतोष मिलता है कि अपना लिट्टी बङी औकात वाला हो गया। वो आज भी मेरा उतना ही लगता है जितना पहले।:-) जय हो।"बस स्टैँड" बस "स्टैंड" नहीं
कभी किसी "बस स्टैँड" पर कुछ
घंटे तो बिताया ही होगा आपने! चाहे छोटा शहर हो या बड़ा,बस स्टैँड का
माहौल कमोबेश पुरे देश मेँ एक जैसा ही होता है।खुलती जाती आती बसेँ,रह रह के हार्न
दबाता ड्राईवर झोला ले के दौड़ते पसेँजर,उसके पीछे अपनी मुँगफली का पैसा लेने
दौड़ता झालमुड़ी वाला:-)।कुछ तो खास किस्म के पसेँजर होते हैँ,वो पुरे समय बस
के पास खड़े वक्त गुजारेँगेँ,पर जैसे बस स्टार्ट हुआ और हार्न दबा कि वो बेल्ट ढीला किये
दीवाल की तरफ दौड़ेँगेँ जहाँ मोटे अक्षरोँ मेँ लिखा होता है" कृपया यहाँ ...
ना करेँ"!असल मेँ ये पढ़ते आदमी निश्चिँत हो जाता है कि ओ आदिकाल से यहाँ पर
"किया जा"रहा है अतः इमरजेँसी मेँ थोड़ा कर ही दिया तो अपराध नही है।ऐसा
आदमी जब तक बेल्ट पेँट पकड़े दौड़ते हाँफते न चिल्लाये "हो हो जरा रोक के
ड्राईवर साब रोक के" तब तक वो सीट पर फीट हो बैठ ही नही सकता। अच्छा स्टैँड
पर बिकने वाली कुछ खास चीजेँ होती हैँ जो हर बस स्टैँड पर हाथ और कंधे पर ही मेँ
बाजार लिये लटकाये बेचते दुकानदार आपको दिख जायेगेँ,जैसे-ताला चाबी,20 रूपये तक के
बच्चे के खिलौने,कलम,कंघी,बेल्ट,जैसे एक्सेसरीज।इन बेचने वालोँ का धैर्य और आत्मविश्वास IIM अहमदाबाद के प्रबंधन
के स्नातक से ज्यादा होता है।आत्मविश्वास इतना गजब कि मैँने एक बेल्ट बेचने वाले
को देखा वो एक धोती पहने बुजुर्ग को बेल्ट दिखा रहा है:-)।वो बुजुर्ग बेल्ट के
बकलस को ऐसे खीँच के उसकी मजबुती देख रहे थे जैसे कोई ट्रैक्टर रस्सा लगा के ट्रक
खीँच रहा हो। बुजुर्ग ने कहा" केतना दिन चलेगा,केतना पैसा इसका?" बेचने
वाले ने झट बेल्ट बुढ़े के हाथ से लिया और जोर से तीन बार जमीन पर पटका "लो
तोड़ के दिखा दो बाबा,ले जाओ एक नंबर चीज है,मिलता नही है,सुपर पीस है,एक दाम है
भईया.कचकच नय,बोहनी का टाईम है,लास्ट 60 रूपिया लेँगेँ"! ना हाँ करके 50 मेँ मामला पट
गया।मुझसे रहा ना गया,मैँने पूछा बाबा आप बेल्ट का क्या किजियेगा? बुजुर्ग ने
हँसते सकुचाते कहा" ऊ पोतवा के लिए ले लिये हैँ,मैटरिक किया
है.कालेज जायेगा अब"।मेरे रोँगटे खड़े हो गये।हाँ ये लाखोँ की गाड़ी मेँ हजारोँ
के कपड़े पहन तैयार हो प्लान कर करोड़ो के मॉल मेँ खरीददारी करने वाला खरीददार नही
है,ये तो वो है जो
बिना किसी प्लान बैठे बैठे केवल 50 रूपये मेँ जिँदगी का सबसे सार्थक लगने वाला सामान खरीद लेता
है।हाँ इसका पोता कॉलेज जो जायेगा बेल्ट पहन के साहब।सच बुढ़ापा अपने बस के भागमभाग
ढेलमपेल वाली भीड़ के सफर मेँ भी भविष्य को लेकर कितना सजग है,कितना संवेदनशील
है।हाँ भला आज के बेफिक्र जवानी मेँ ये सजगता और संवेदना कहाँ के अब कोई हामिद
दादी के लिए चिमटा खरीद लिये जाय। अच्छा चलिए स्टैँड की दुसरी ओर:-)।पानी वाली चाय
और बिना दाना का मुँगफली,झौँसाया भुट्टा,पहलवान दाँततोड़ु चना ये सब बस स्टैँड
का सेट मेन्यु है। अच्छा स्टैँड पर आपको किताब विक्रेता मिलना ही मिलना है।ये
नर्सरी की अंग्रेजी किताब से शुरू करेगा।फिर जोर जोर से हनुमान चालीसा,शिव चालीसा
बोलेगा और फिर चुटकुले की किताब निकालेगा"सर जीजा साली के हँसी के चुटकुले
निकालेँ"! फिर गाने की किताब।मालुम आज यो यो हनी के दौर मेँ मुकेश के दर्द
भरे नगमे और रफी के रोमाँटिक गीत अगर जिँदा हैँ तो इसी किताब वाले के कंधे पर।और
अँत मेँ धीरे आवाज मेँ कहेगा"जी कुछ और लिजिएगा क्या:-)"।आदमी झेँप जाता
है और अपनी उत्कंठा को मिनिमाईज करते हुए आदमी अंत मेँ "सरस सलिल" ले के
खुद को समझा बुझा लेता है।और हाँ अक्सर बस मेँ एक खास आईटम बिकता है"हाथ से
जूस निकालने की घुरनी वाली मशीन"।ओह ऐसा मौसंबी का रस निकाल के दिखाता है कि
क्या कहेँ,पर मैँने दस बार लिया होगा आज तक एक ग्लास ढंग से नहीँ निकला
संतरा या मौसंबी का रस।:-) बस खुल गई।।बस स्टैँड सदा खुला रहता है।यही सब तो उन
कुछ जगहोँ मेँ हैँ जहाँ जीवन कभी ठहरता नहीँ है।आना जाना लगा है साहब।हम सब एक बस
के यात्री ही तो हैँ साहब:-)।जय हो।
Saturday, November 8, 2014
"रेलगाड़ी"..एक दिन का घर
"रेलगाड़ी" मेरे जीवन मेँ एक शिक्षक,एक संस्थान,एक गाईड की तरह है। मैँने न जाने देश दुनिया के कितने रंग इसी रेलगाड़ी मेँ देखे और न जाने कितनी बातेँ जानी सीखी और न जाने कितने दर्शन समझे।मैँ खोरठा बोलने वाला झारखंडी खाली रेल चढ़ चढ़ कर मैँने मागधी,मैथिली,बांग्ला,अंगिका,भोजपुरी,मारवाड़ी,छत्तीसगढ़ी और मोटा मोटी पंजाबी टाईप जैसी कई तो भाषाएँ सीख ली। कहीँ जाऊँ ना जाऊँ पर दिल्ली हावड़ा करते करते ही उत्तर दक्षिण-पुरब पश्चिम पुरे भारत का रंग ढंग साईड अपर सीट पर बैठे बैठे देख लिया।अब देखिए न रेल क्या क्या सिखाता और कर के दिखाता है।एक छोटी घटना देखिए। अभी घर को जा रहा था।रेल मेँ एक परिवार साथ साथ सफर मेँ था। रात को जब पति पत्नी बच्चे सब खाना निकाल बाँट खाने लगे तो एहसास हुआ कि "एक रेलगाड़ी ही ऐसी जगह है जहाँ एक मध्यम वर्गीय शहरभोगी भारतीय परिवार अपने पुरे सगे-सदस्योँ के साथ बैठ के सुकुन के साथ खाना खाता है"।ना कोई हड़बड़ी ना कोई फोन ना जल्दी जल्दी खा के काम को भागने की टेँशन। नही तो देखिये न साहब एक शहरी "मीडिल खलास"(क्लास:-)) परिवार की दिनचर्या।सुबह 6 बजे बच्चा उठ जाता है,मम्मी पहले हड़बड़ हड़बड़ बुतरूआ को जैसे तैसे पोँछ कपड़ा पहिना तैयार करती है, फिर बेचारी बिना मुँह धोये बिना नहाये दौड़ी किचन जाती है,बच्चे का नाश्ता खाना पैक किया, एक हाथ मेँ सेँडविच और दुसरे मेँ एप्पल थमा स्कुल बस तक छोड़ आयी।इधर बच्चे को छोड़ आई कि 7.30 तक बच्चे के पापा जग गये,पेपर पढ़ते हुए चाय पिया, जल्दी जल्दी नहाया फिर अकेले टेबल पर पत्नी ने नाश्ता कराया और निकल गये काम पर।तब जा के पत्नी नहाई और अकेले दिन का खाना खाया।3 बजे बच्चे स्कुल से आये,माँ ने खाना गर्म कर बच्चे को खिलाया।शाम को थका हारा पति आया!अकेला टीवी देखता हुआ चाय पिया।तब तक बच्चे खेल कुद के आये।जल्दी खा के पढ़ने बैठे और सो गये।तब तक पापा को भुख लगी।पत्नी किचन से गर्म गर्म रोटी सीधे निकाल खिलाई,पति भी गया फिर सोने,अंत मेँ थरिया कढ़ाही समेट 10.30 तक पत्नी ने खाना खाया। मतलब शायद ही कोई ऐसी तारिख हो जब पुरा परिवार एक साथ तीन टाइम खाना खा पाये। पर भारतीय रेल जिँदाबाद।8 बजे थे कि सीट के नीचे से झोला निकाला,डब्बे से पुड़ी निकाला,प्लेट मेँ आलु गोभी का भुजिया।तब तक मेँ पति ने कहा"पीला वाला पॉलिथिन किधर रखी हो,उसमेँ अँचार होगा निकालो"!इतने मेँ अपर सीट से पलटु उछल के नीचे आया"पापा हमुँ खायेँगेँ"! मम्मी ने तब तक कहा "चलो रिँकीँ को जगाओ"।इतने मेँ पत्नी ने लाल डिब्बा निकाला" ऐ जी एगो पेड़वा ले लिजिए नय त फेर खराबे न होगा"!पति ने एक पेड़ा उठाया,दो पुड़ी अपनी से ले पत्नी की तरफ सरका दिया।इधर पल्टु चिल्लाया"मम्मी तीता लगा.बाप रे पानी दो,नय पापा पेप्सी"। "चुप माजा रखा है पीयो पहले" तुरंत निकाल दिया मम्मी ने।पेपर बिछा है,पुरा परिवार एक साथ हिचक लटक के चलती ट्रेन मेँ जिँदगी का सबसे सुकुन वाला डिनर कर रहा है।रेल अगर 10-20 घंटे लेट है तो क्या साहब।एक शानदार यादगार डिनर और बन जाता है:-)सच रेल को घर मान कर केवल भारतीय ही यात्रा करता है और रेल को घर बना कर उसके साथ कुछ भी केवल भारतीय ही करता है साहब:-)।एक भारतीय ही है जो ये कतई नहीँ सोचता कि वो एक 10-20 घंटे के सफर का एक यात्री भर है और किराया दे के चढ़ा है फिर अपने स्टेशन उतर जायेगा, वो अपनी सीट से इतने भावनात्मक रूप से जुड़ जाता है कि जैसे वो सीट उसने बड़का बाबू से हिस्सा कर कोर्ट मेँ केस कर जीत के पाया है:-) "भारतीय रेल" की बात...हजारोँ बातेँ हैँ।एक एक कर जो देखा समझा सुनाता रहुँगा कभी कभार जी:-)।सच रेल कितनी भी लेट पहुँचे पर भारतीय रेल मेँ जीवन बड़े गति मेँ होता है साहब।जय होMonday, October 27, 2014
एक रात रूहानी
गाँव मेँ हुँ।रात के 11.30 बज रहे हैँ।खटिया पर कंबल ताने सोया हुआ हुँ।एक लालटेन अँधेरे मेँ उम्मीद की तरह खटिया के ठीक पास मेँ धीमे कर जला रखा हुआ है।आसपास बिलकुल सन्नाटा है,झीँगुरोँ की आपस मेँ खुसुर फुसुर के अलावा एकदम सन्नाटा है। घर के ठीक पीछे सियार की हुँआ हुँआ की धीमी आवाज आ रही है।कही लगभग किलोमीटर की दूरी से हरि कीर्तन की मध्यम आवाज आ रही है।अभी अभी तुरंत एक आवाज आयी है सामने के नीम के पेड़ से,पता नही कौन सा पक्षी है।ऊपर खपरैल पर वर्षा के पानी की कुछ बुँद गिरी हैँ,मानो घुँघरू बजे होँ।बीच बीच मेँ गली के वफादारोँ के भुँकने की आवाजेँ आ रही हैं,शायद सुरक्षा पर विमर्श चल रहा होगा।साँय साँय पछिया बह रही है। घर के दरवाजे पर रजनीगँधा और रातरानी गम गम कर रही है। सच कहता हुँ, अगर आप शहर मेँ सोये हैँ तो मेरा दावा है, ऐसी रूमानी रात ला के दिखा दिजिए। माफ करियेगा आज मैँ तो "बादशाह हुँ और मैँ आपको अगर एक घुटन वाली कर्कश रात मेँ फँसा "कंगाल" कह दुँ,तो प्लीज बुरा मत मानियेगा.... 5 दिनोँ बाद मैँ भी फिर से कंगाल हो जाऊँगा।मेरी बादशाहत भी लुट जायेगी,ये रात चली जायेगी।क्योँकि वापसी का टिकट है, फिर शहर को जाना है। जय हो
Saturday, October 25, 2014
छठ- घर नहीं गाँव का परब
जी हाँ कुछ दिन दुनियादारी की सारी दवा और बीमारी छोड़ अपने गाँव आ गया हुँ।आस्था और पवित्रता का महा-लोकपर्व "छठ " आरंभ होने को है।एकदम से लगता है जैसे आदमी से लेकर प्रकृति तक सब "छठ" के रंग मेँ रंगे होँ।कितने कमाल की बात है साहब के दुनिया बदली,लोग बदले,रहन सहन बदला,पर्व त्योहार मनाने का तरीका भी बदला, दशहरा बदला और दिवाली बदली पर "छठ" का रंग कमोबेश वैसा ही रहा है अब तक,फिर भी तब और आज मेँ बहुत कुछ बदला है।आपको बताउँ छठ का माहौल, आदमी तो आदमी, प्रकृति भी मानो जैसे नहा धोकर तैयार हो छठ मनाने को।चार दिन के इस पर्व का हर बिता साल मुझे याद है।कदुआ भात के दिन ही घर धोआ पोछा और गोबर से लिपा के मंदिर मेँ तब्दील हो जाता था।अब हम बच्चोँ के लिए घर दुसरे देश की सीमा हो जाती थी।इधर मत आओ,तो उधर मत खाओ, तो उधर मत खेलो,हाय जाएँ तो जाएँ किधर।पर मालुम यही वो तीन दिन होता था जब हम निश्चिँत होके वैध रूप से दिन भर घर से बाहर खेलते रहते थे।अच्छा इस दिन खास करके कद्दु की सब्जी बनती है सो कद्दु तो मानो उस दिन एक दिन के लिए सब्जियोँ के राजा के राजसिँहासन पर काबिज होता है,पनीर तक पर उस दिन कद्दु भारी पड़ता है। मुझे याद है कि नानी तीन दिन पहले ही पड़ोस की "मलतिया माय" को कद्दु बुकिँग के लिए कह देती थी।देखिये न अबकी ना मेरी बुढ़िया नानी रही ना मलतिया माय,अब बस बाजार रह गया तभी तो एक कद्दु 130 रू का खरीदा अबकी।दुसरे दिन सुबह ही हम कुदाल पटरी लेके नदी पर घाट दखल करने चले जाते थे।इस टीम मेँ कई घाट मेकर स्पेशलिस्ट होते थे।पटरी से हम घाट पर ऐसी महीन कारीगिरी करते मानो ताजमहल को फिनिशिँग टच देँ रहेँ होँ। इधर 8 बजते पुरा हटिया बाजार डाला सुप और नारियल,गन्ना,कच्ची हल्दी और सेव-नारंगी केला से पट जाता।तब तक "बुधनी माय" खबर ले आती थी की "धुजी महाराज" के मिल धोयाय गैलो छोँ। फिर वही गेहुँ पिसा के लाती।फल खरीदा के और गेहुँ पीसा के आते ही खरना की तैयारी शुरू हो जाती।रात को प्रसाद के रूप मेँ ढ़ेँकी मेँ कुटे चावल और गुड़ की दुध की बनी खीर बनती।रात को जमीन पर पुआल बिछता और उसी पर सभी परबतिन का सोना होता। फिर सुबह होते मुहल्ले की "तेतरी माय", "बुधनी माय", और "टिकला माय" सहित नानी सब मिल प्रसाद बनाने मेँ लग जातीँ।कोई ठेकुआ बनाता तो कोई कचवनिया,।ठेकुआ मेँ भी गुड़ वाले के स्वाद का क्या कहना, मेरा सबसे पंसदीदा प्रसाद यही है और साथ ही कचवनीया भी।सब प्रसाद बनाते और एक साथ समवेत् स्वर मेँ छठी माई के गीत भी बिना रूके गाये जाते"काँचही रे बाँस के बहँगिया और उगहुँ सुरूज देब भईल भिनसरवा" जैसे गीत मानो आत्मा तक को माँज रहेँ हो।गीतोँ मेँ भी आह शारदा सिन्हा के गीत तो मानो गीत नही,छठ के सिद्ध मंत्र होँ,कानो मेँ घुलते ही मानो मोक्ष मिल गया हो।इधर हर घर के मर्द या बच्चे अपने अपने घर से निकल झाड़ु लगाते दिख जाते जिस रास्ते लोगोँ को छठ घाट जाना होता।पुरा का पुरा समाज इसमेँ रमा होता था। यहाँ तक कि मुस्लिम भाई लोग भी अपने घर के सामने रास्ते पर एहतियातन सफाई बरतते की किसी छठ व्रती को दिक्कत ना हो।फिर शाम को डाला सुप के लिये घाट जाना और सुबह की आतिशबाजी देखने के लिए पुरी रात बैचेनी मेँ जग के गुजारना और सुबह सबसे पहले घाट पहुँच जाना अब भी रोमांचित करता है।जी इधर कुछ सालोँ से हमारे क्लब द्वारा अर्घ्य हेतु दुध का वितरण किया जाता है सो इसके इंतजाम के बहाने आज भी हम उसी रोमांच को पुनः महसुस कर ही लेते हैँ। जी युँ तो सब कुछ बदला है पर सौभाग्यवश छठ का माहौल बदला हुआ होकर भी बहुत पुरानी चीजेँ अपने साथ रखे है। आध्यात्मिक चमत्कार की बात ना करेँ तो भी अपने सामाजिक सरोकार, परस्पर सहयोग और समन्वय तथा प्रकृति और मानव के सहसंबंधोँ को दर्शाने वाले इस महान लोकपर्व का स्वरूप अपने आप मेँ अनुठा है। आप दिवाली हो या होली तो अपने मे सिमट अपने तरीके से मना सकते हैँ पर छठ तो भइया एक परंपरा और नियम से बँध पुरे समाज के साथ ही मना सकते हैँ जिसमेँ टिकला माय भी होँगी और बुधनी माय भी। इस सामासिक व्यापक समन्वयकारी पर्व मेँ एकाकीपन की कोई जगह नहीँ।इस महान लोकपर्व का सरोकार इतना व्यापक है के पुरे समाज को एक माला मेँ गुँथे बिना इस पर्व का चक्र पुरा ही नहीँ हो सकता।ये बस अपनोँ मेँ खुशियाँ बाँटने का पर्व नहीँ है बल्कि ये तो पुरे समाज के एकसाथ उत्सव मनाने का पर्व है।यह प्रकृति को पुजने का पर्व है और डाला सुप के बहाने मानव को मानव से जोड़ने का पर्व है साहब।यही एक ऐसा अदभुत् पर्व है जिसे डिप्टी कलेक्टर साहब की माता और बुधनी की माता दोनोँ एक साथ मनाती हैँ।एक ऐसा महान उदार पर्व जहाँ उगते सूर्य के साथ डुबते को भी अर्घ्य दिया जाता है,नमन किया जाता है,शीश नवाया जाता है।हम भाग्यशाली हैँ कि हमेँ परंपरा मेँ एक ऐसा महान अनुठा लोकपर्व मिला है जो इस बदलते हुए दौर मेँ भी अपने महान सामाजिक सोदेश्यता के साथ स्थापित है और ये सदा रहेगा।पुरबिया आदमी चाहे कितना भी पछिया की लपेट मेँ आ जाये पर छठ मेँ 4 दिन पुरब की ओर जरूर लौट आता है।बंबई,दिल्ली या कलकत्ता हर तरफ से भेड़ बकरीयोँ की तरह रेल भर भर कर लाये लोग पटना,बक्सर,आरा या सीवान,छपरा के स्टेशन मेँ उतारे पटके जा रहे हैँ।ऐसी अमानवीय दशा मेँ यात्रा के आदमी दम घुँट मर जाये, पर वो तो परंपरा और माटी की जड़ की ताकत है कि रेल चाहे जैसा भी हो आदमी रगड़ा,लटका खिँचा आ ही जाता है घर तक।चलिये छोड़िये,आप मेँ से जो छठ की परंपरा से नही हैँ, यु ट्यब सर्च कर एक बार छठ के गीत जरूर सुन लिजिएगा आप भी,उसमेँ भी शारदा सिन्हा जी के गीत,सुखे मेँ रस भर जायेगा,चित्त इतना शाँत जैसे वर्षोँ के ध्यान के बाद कोई तपस्वी उठा हो। आप सभी को छठ पूजा की शुभकामना..जय होThursday, October 9, 2014
चुहानी टूट गईल नानी
आज जब खाना बना रहा था के अचानक कड़ाही से उठे मसालेदार खुशबु वाले भाँप से मन के भीँगते ही जाने कितने यादोँ के कोँपले फूँट पड़े। तब के खान पान पकान और आज की शैली मेँ बड़ा फर्क आ गया। तभी याद है के घर मेँ अलग से एक रसोईघर होता था जिसे हमारे यहाँ"चुहानी"कहते थे। यह समान्यतः आवासीय कमरे से थोड़ा हट के होता था,कारण ये था के तब घर मेँ दो ही स्थान पवित्र माना जाता था एक तो पूजा घर दुसरा रसोई घर।क्या मजाल के कोई जूता चप्पल पहने 'चुहानी' मेँ घुस जाये।रसोई मेँ 'देवी अन्नपुर्णा' का वास माना जाता था और जाने अनजाने इस विश्वास और पवित्रता के कारण बड़ी सफन सफाई वाला भोजन बनता था वहाँ। माटी का चुल्हा होता था और माटी के फर्श से लेकर चुल्हे तक की रोज गोबर से लिपाई होती थी और उसके बाद बुढ़ी माई टीका लगाती तब चुल्हे पर कड़ाही चढ़ती थी।अच्छा तभी जब सब्जी के लिए"लोढ़ी पाटी" पर मसाला पीसाता तो गरड़ गरड़ की आवाज आँगन मेँ ऐसी गुँजती मानो ठीक बरामदे के किनारे से रेल जा रही हो।सब्जी की कड़ाही को चुल्हे पर चढ़ा उपर से थाली ढक दिया जाता और थोड़ी देर बाद उससे भाँप की फुड़ फुड़ की आवाज आती और उपर का थाली नाच नाच बताता हुआ प्रतित होता था के "लो अम्मा सब्जी बन गई,उतार लो "।बिना MDH और EVEREST के टोला गमकता था, ऐसा जादू था उन कच्चे मसालोँ और माँ के पक्के हाथोँ मेँ।खाना खाने का भी एक शास्त्रीय नियम सा था। कच्चे फर्श पर पोछा लगा के वहीँ पीढ़ा या बोरा बिछा के आसन लगता।याद आता है के नाना खाना खाते और बुढ़िया नानी पंखा झलती। आज के नारीवादी इसे शोषण और गुलामी कह सकते हैँ पर ये उनके लिए स्नेह और समर्पण था जो आखिरी दम तक रहा।वे बिना शिकायत खुशी खुशी अपनी जिँदगी जी के, दुनिया को बहस करता छोड़ गये।आज सब कुछ बदल गया साहब।पता नहीँ किसने अफवाह फैला दी।औरतोँ के लिए खाना बनाने को चुल्हा झोँकने का नाम दे दिया गया और रसोईघर को कालापानी घोषित कर दिया गया।रसोई से मुक्ति को भी नारी मुक्ति का नारा मान लिया गया। नारा बुलंद हुआ।अपने अर्थोँ मेँ नारी जग गईँ शायद और चुल्हे पर पानी डाल दिया गया,कड़ाही उलट नारी निकल पड़ी और चुहानी ध्वस्त कर दिये गये।अब किचन आ गया। नारी ने कहा हम अब सशक्त हुए सो खाना नहीँ बनायेँगेँ,पुरूष ने कहा हम तो सदियोँ से सशक्त हैँ सो हम भी नहीँ बनायेँगेँ।नतीजा खाना नौकर बनाने लगा। माँ बहन या पत्नी पंसद के हिसाब से बनाती थी पर नौकर आपकी औकात के हिसाब से बनाता है।तब थाल मेँ प्यार परोसा जाता था अब बस गीला-सुखा खाना परोसा जाता है।अब चम्मच से खाते हैँ तब मन से खाते थे।अब आदमी के पास न बनाने का वक्त है न खाने का। तभी तो अब 2 मिनटस् मेड मिल आ गया है।2 मिनट मेँ बनता है और 7 दिन मेँ पचता है।पता नहीँ आदमी शांति से बैठ खा भी नहीँ रहा बस भुखा प्यासा जमा करने मेँ लगा है।उसे कौन बताये के जमा चीज एक दिन सड़ ही जाती है चाहे कितना जमा कर लो। आदमी काश एक दिन शांति से बैठ पेट भर खाता तो उसकी भुख मिटती और तब वो संतोष पाता फिर शायद इस कदर ना जमा करने के पीछे भागता फिरता।एक दिन बैठ प्रेम से पेट भर खाये तब तो पेट और भुख का अंदाजा लगे पर उसके पास रिश्वत से लेकर देश तक खाने का वक्त है पर भोजन के लिए समय नहीँ है। शायद यही कारण है कि भुखा आदमी आज भी दौड़ रहा है जमा करने को..खुब जमा करने को..अपनी भुख से कई गुणा ज्यादा।:-)क्योकि उसे अपने पेट का अंदाजा ही तो नही है साहब।सो जाईए एक दिन शांति से बैठ के जरूर खाइए।यकिन मानिए मजा आ जायेगा और बहुत कुछ बदला बदला लगेगा हुजुर।जय हो..
Saturday, September 20, 2014
बयान-ए-आशिक़
बिलावल के बयान पर हाय तौबा वाली बात ही नहीँ है चचा। असल मेँ बयान बिलावल ने नहीँ, "उसके अंदर के आशिक " ने दिया है।ये जरदारी के बेटे का नहीँ,हिना के दिवाने का बयान है:-)। चचा "कश्मीर" धरती का स्वर्ग यानि "जन्नत" कहलाता है। दुनिया का हर आशिक अपनी मेहबुबा के कदमोँ मेँ जन्नत रख देने का भोकाल टाईप डॉयलॉग देता आया है, आज बिलावल ने भी दे दिया तो कऊन जन्नत जाने लगा हमारे हाथ से:-)।देखिये सामान्यतः "आशिक" अपने आप मेँ एक मॉडिफायॅड सभ्रांत सुशील लुच्चा होता है।कहता ही है "ई कर देँगेँ,ऊ ला देँगेँ "। देखिये न आप ही नहीँ बोलेँ होँगेँ क्या "माँग मेँ तारे भर दुँगा, गर्दन मेँ सितारे लटका दुँगा":-Pपर कबो किये थे का ऐसा?नहीँ न। दुनिया के लाखोँ जोड़े आज भी रोज हमारे ताजमहल के आगे अपनी धनिया,रामप्यारी,कबुतरी,रूक्साना, जरीना,नगमा,बॉबी,मैरी,चेरी आदि अनादि का हाथ पकड़ के कहते आये हैँ " मैँ भी तुम्हारी याद मेँ ऐसा ही ताजमहल बनवाऊँगा "। पता करवा लिजिये कोई एक भी ट्रैक्टर ईँटा बालु गिरवाया क्या इस नाम पर:-)। सो जाने दीजिये दिवाने का बयान है, कश्मीर का वादा किया है,कश्मीरी पुलाव खिला देगा और समझा लेगा मेहबुबा को। एक बात जरूर जान लिजिये चचा,भारत हो या पाक या दुनिया मेँ कहीँ,विरासत की राजनीति मेँ "आवारा पागल दिवाना मस्ताना " ही पैदा होते हैँ, नेता नहीँ।। जय हो
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