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Thursday, March 3, 2016

दुर्गा-महिषासुर Durga Mahishasura

प्रिय मित्र लल्टु, कल ही गाँव से लौटा हूँ।तुम्हारे घर पर भी सब ठीक है।चाची(तुम्हारी माँ) ने तुम्हारे लिए पंडी जी से जन्मपत्री दिखाई थी,फिर कहने पर दुर्गा पूजा कराया।तुम्हारे नौकरी चाकरी के लिए परेशान है।तूम्हारे खातिर पूजा का प्रसाद और हवन का भभूत भेजा है,शाम को जब गाँजा खरीदने कैँपस से बाहर निकलो तो बताना हौज खास मेट्रो पे आ दे दूँगा।मित्र अब माँ तो माँ ठहरी,उसे मैँने ये बताना उचित ना समझा कि तूम अब महिषा जी के साथ हो गये हो,उनको इसका ऐतिहासिक और समाजिक न्यायिक कारण समझाने मेँ एतना देर लगता कि मेरा ट्रेन छुट सकता था और शायद तब भी आकंठ दुर्गाभक्ति मेँ डुबी वो अनपढ़ बुढ़ी माँ महिषा जी के सामाजिक न्यायिक पक्ष को समझ पाती कि नहीँ,पता नहीँ।खैर तुमने अच्छा किया कि एक नया खेमा धर लिये हो।इतने साल तक साथ साथ दुर्गा पूजा कर भी हमने कौन सा तीर मार लिया,रेलवे मेँ गैँगमैन तक का भी तो फार्म ना किलियर हूआ।तो अब क्युँ ना एक बार महिषा ट्राई किया जाय।दोस्त मैँ तुम्हारे साथ हूँ।लेकिन अब जब खुल्लमखुल्ला महिषा जी के साथ हो तो इन्हेँ समाज मेँ अधिक से अधिक मान्यता दिलाने और स्थापित करने के लिए थोड़ा मेहनत भी करना होगा,ये साल भर मेँ एक दिन शहादत दिवस मनाने से कुछ ना उखड़ना लल्टु भाय।उल्टे डिमोरलाईज फिल होता है।देखो हमेँ वो प्वाईँट पकड़ना होगा जिससे दुर्गा या अन्य देवी देवता ने हजारोँ साल से अपना मार्केट जमाया है।देखो ये दुर्गा समर्थक अपने बाल बच्चोँ का नाम भी दुर्गा,भवानी,शारदा इत्यादि रखते हैँ जिससे रोज पुकारने बोलने से ये नाम जेहन मेँ रहे और प्रभाव बना रहे।अब हमेँ भी अपने लोगोँ का नाम महिषासुर,भैँसचढ़ा,लमबलवा,ईत्यादि रख इस नाम को प्रचलित कर इसे मान्यता दिलानी होगी।सोचो कोई लड़का पीएचडी कर निकलेगा और नाम होगा "डॉ महिषासुर मंडल",कोई प्रोफेसर होगा "भैँसचढ़ा चौबे"।कितना जादुई बौद्धिक छवि बनेगा तब महिषा जी का।अच्छा जैसे ये दुर्गा खेमे वाले अपने मेँ कहते हैँ"फलना दुर्गा जैसी सुंदर है,देवी लगती है",हमेँ भी अपनोँ के बीच महिषा जी की आकर्षक छवि गढ़नी होगी और एक दुसरे को बोलना होगा"महराज केतना सुंदर लड़का है,एकदम महिषासुर लगता है,दाँत देखिये,लगता है दाँते से नारियल फाड़ देगा"।अच्छा जिस तरह दुर्गा खेमे वाले अपने देवी गुणगान के लिए दुर्गा चालिसा,सप्तशती और आरती वगैरह लिखा है हमेँ भी कुछ नया लिख लॉँच करना होगा।जैसे चालिसा कुछ ऐसा लिखा जा सकता है"महिषा सोये थे खा के मुर्गा,सुतले मेँ त्रिशुल भोँक गईँ दुर्गा।।महिषा को कंफ्युजन भारी,घर घुसी कैसे ये नारी।।महिषा ने गुस्से मेँ देखा,दुर्गा ने सुदर्शन फेँका।।महिषा को हुई चिँता भारी,एतना पावर मेँ कैसे एक नारी।।महिषा ने एक चाकू निकाला,दुर्गा ने तलवार और भाला।।दुर्गा बोली तू शांति भंग करता है,लेडिज को तंग करता है।।बोले महिषा आरोप है झुठा,इस हफ्ते तो ना किसी को लुटा।।महिषा तू बामपंथ समर्थक,काम करता है खाली निरर्थक।।महिषा बोले रह होश मेँ देवी,वर्ना वसुलूँ जगत से लेवी।।भले दे त्रिशुल मेरे कंठ पर,वार ना करना बामपंथ पर।।ऐ नारी ले काम अकल से,सोये मेँ मारे है छल से।।ऐ महिषा अब होश मेँ आजा,खड़ी यहीँ हूँ जा मुँह धो के आजा।।तू पुरूष मारे है बल से,मैँ मारी तो बोले छल से।। मित्र लल्टू कुछ ऐसा चालिसा लिख हम महिषा जी के प्रति सहानुभुति और उनकी वीरता का भोकाल बना दुर्गा को छल से मारने वाली साबित कर उन्हे बैकफुट पर धकेल सकते हैँ।अच्छा एक मेन बात कि दुर्गा खेमा उन्हेँ अपनी माँ बता जय माता दी टाईप टैग लाईन लगाये रहता है,क्युँ ना हम भी महिषा जी को एज ए फादर लॉँच कर "जय पप्पा जी" टैग लाईन बना लेँ।अच्छा ये लोग दुर्गा जी के बारे मेँ कई मिथक जुटा उनको गुणकारी,शक्तिशाली,विद्वान,नैतिक दिखाने वाला ग्रंथ रचे हैँ।इसके जवाब मेँ हमको भी कुछ झुठ साँच जोड़ एक महिषासुत्त रचना होगा जिसमेँ किस्सा होगा"महिषा एक बहुत ही भोला भाला सीधा नौजवान था जिसका सारा ध्यान अपने कॉलेज की पढ़ाई पर रहता था।एक दिन कॉलेज जाते वक्त उसे रास्ते मेँ कुछ लड़कियोँ ने छेड़ दिया।उसने तुरंत कॉलेज जा रोते हुए प्रिँसिपल से उन लड़कियोँ की शिकायत कर दी।इसी बात से क्षुब्ध लड़कियोँ मेँ एक दुर्गा ने बदले की भावना से रात को लाईब्रेरी मेँ पढ़ते पढ़ते सो गये महिषा पर छल से वार कर दिया"।मित्र लल्टू ये कथा पढ़े लिखे बुद्धिजीवियोँ को अपने खेमे मेँ खिँचेगी।एक पढ़ने लिखने वाले भोले युवा महिषा का शोषण कोई भी करूणा और दया एवं प्रगतिशिलता से भरा बुद्धिजीवि बर्दाश्त ना करेगा और हमारे महिषा खातिर देश भर मेँ समर्थन जुटने लगेगा।अच्छा लास्ट मेँ एक आरती भी लिखना होगा जिसे एक मीका से,दुसरा दलेर मेँहदी से गवा लेँगे क्योँकि अनूप जलोटा और नरेँद्र चंचल दुर्गा खेमे के गायक हैँ और उनका संगीत भी अब आउटडेटेड हो चुका है।मीका गायेगा"बैल,भैँसन लंगुर की..आरती कीजे महिषासूर की"और दलेर एक झुमाऊ आरती देँगे"सड्डे भैँस चढ़ोगे तो ऐश करोगे"।देखना ये सुन लोग पल्सर बेच भैँस खरीद लेँगे।तो मित्र लल्टू अगर सच मेँ महिषा के साथ प्रतिबद्धता के साथ खड़े हो उनके लिए कुछ करना चाहते हो तो ये सब उतनी ही इमानदारी करके दिखाओ जितनी ईमानदारी से दुर्गा खेमे वाले अपनी माँ दुर्गा के लिए कर दिखाते हैँ।और केवल ये सब बस एक क्षणिक आवेश मेँ आके यूनिक दिखने का तमाशा भर है और बस विरोध के लिए विरोध का हथियार भर है तो मुझे अफसोस है कि मैँ एक अवसरवादी भड़काऊ नकारे आदमी का मित्र था जो ना मेरा हुआ,ना माँ के भभूत का,ना दुर्गा का,ना महिषा का।अब हजारोँ साल से स्थापित मान्यता को एक दिन की बकलोली या एक शहादत दिवस और चंद पर्चोँ पोस्टरोँ से तो ना ढाह पाओगे मित्र।कुछ तगड़ा और लगातार करो। एक ऐसा बस विध्वंसक भर ना बनो जो कल अपने मतलब और अपने विचारधारा के खुराक के लिए रावण और भस्मासूर का भी उपयोग कर ले।कम से कम जिसके साथ रहो.पुरी ईमानदारी के साथ मरते दम रहना..चाहे दुर्गा या चाहे महिषा।भयंकर शुभकामानाएँ तुमको।जय हो।

Saturday, February 27, 2016

"महिषासुर शहादत दिवस"

महिषासुर की मौत को स्वीकार कर "महिषासुर शहादत दिवस" मनाने से एक अर्थ तो साफ है कि देवी दुर्गा के अस्तित्व को तो सब स्वीकार करते हैँ और ये भी कि जेँटल महिषा कुमार जी का मर्डर हुआ है।ऐसी हालत मेँ महिषा खेमे के लोगोँ को राजनीति और आंदोलन से ज्यादा स्वास्थ्य पर ध्यान देने की जरूरत है क्योँकि जो दुर्गा महिषा जैसे परम जेँटलमैन और शक्तिशाली योद्धा का वध कर सकती है वो आज के पेँसिल जैसी काया लिए सिगरेट फूँक फूँक नारा लगा के हाँफते और थक के बर्गर खाते क्रांतिकारियोँ का कितना लोड लेगी और कब त्रिशुल घोँप देगी कोई भरोसा नहीँ।सो आईए "राईट टू एक्सप्रेशन" की जगह"राईट टू हेल्थ" पर काम करेँ।और हाँ ये पल्सर बेच के भैँसा चढ़िये..दुर्गा समर्थकोँ के बीच आपका भोकाल टाईट होगा और माहौल तो बनेगा थोड़ा क्योँकि ये दुर्गा की तरह शेर थोड़े चढ़ते हैँ:-)।जय हो।

Wednesday, February 10, 2016

आदमी देवता हो जाना चाह रहा है।

आदमी देवता हो जाना चाह रहा है।वो चाहता है कि वो बोले और लोग उसे ईश्वर की तरह सुनेँ।वो शायरी,कविता,कहानी,उपन्यास,संस्मरण और न जाने कहाँ कहाँ से दया,करूणा,निष्पक्षता,समानता,सब बटोर फेसबुक पर अपना मंदिर खोले बैठा है और वो चाहता है कि उसके मंदिर के आगे लंबी कतार लगी रहे,लोग लाईक चढ़ायेँ..धन्यवाद का प्रसाद ग्रहण करेँ और पुनः आयेँ।मगर इन सब के बीच जरा सोचिए कि चलिए मैँने किसी को अपना "भगवान" मान लिया।आप जानते हैँ भगवान होने का मतलब?मैँ चाहुँगा सुबह चार बजे उठ अपने भगवान को ठंडे पानी से नहवाना।उनकी काँख मेँ जमेँ काई को किसी लाल कपड़े से रगड़ रगड़ छुड़ाना।गीले वस्त्र पहनाना और फिर शुरू करूँगा उनका पूजन।सबसे पहले भगवान के सर नारियल फोड़ना चाहता हुँ।फिर डालुँगा उसके सर पर तीन दिन का रखा कच्चा लठलठ करता दुध। मैँ चाहता हुँ उसके कपार पर पहले चंदन रगड़ देना और फिर पुरे मुँह पर लाल अबीर का लेप।फिर घसुँगा लाल रोली और उस पर दही शहद का घोल।मैँ खोँसना चाहता हूँ उसके दोनोँ कानोँ पर कनेल के पीले फूल और चढ़ाना है मुझे उसके सर पर धतुरा का सफेद फूल।दो गेँदा फूल उसकी टाँग के बीच रखना है और एक बेलपत्र साटना है उसके पेट पर।फिर खिलाना है बिना उसकी पसंद पूछे अपनी औकात के हिसाब से खरीदी गई लालमोहन साव की दुकान वाली ठोस लड्डु।एक टुकड़ा तोड़ ठुँसना है उसकी अधखुली मुँह मेँ और चुलू भर पानी करना है अर्पण उसकी प्यास बुझाने को।फिर चढ़ाऊँगा उसके कंधे पर दो गलगलाये केले और पिचके संतरे की दो फाँक।फिर निकालुँगा अपने झोले से भर मुट्ठा अगरबत्ती और जला के खोँस दुँगा ठीक उसकी कमर के पास जिससे निकलने वाला गमकदार धुँआ लगातार उसकी आँखोँ और नाक मुँह मेँ घुसता जायेगा और वो कुछ ना बोलेगा।इसके बाद श्रद्धा से बिना निशाने फेकुँगा उसके देह पर कुछ खनखन करते सिक्के जो उसके सर लगे या आँख पर इसकी कोई गारंटी नहीँ।मेरे और जाने के बाद भी खुली रहेगी उसकी चौखट जहाँ घुस आयेगी कोई बकरी और खायेगी उसके काँख से नोच कर फूल और पेट पर से खीँच कर बेलपत्र।एक कुत्ता घुस आयेगा जो चाटेगा उसके पैर जहाँ कुछ देर पहले गिराये थे मैँने लड्डु और दही शहद की कुछ बुँदे।उसके बदन पर चढ़ी रहेँगी काली चीटियाँ और जायेगी मुँह तक जहाँ मेरे द्वारा ठुँसे लड्डु के कुछ कण फँसे हुए थे।मेरा भगवान तब भी कुछ ना बोलेगा।वो हाथ उठाये मुस्कुराते फिर भी कृपा की मुद्रा मेँ ही होगा।वो सबको कृपा देता है।उसकी करूणा और समानता का आलम ये है कि वो आदमी,बकरी और कुत्ते का फर्क नहीँ करता।वो मंदिर नहीँ बदलता,वो घिस जाता है पर तटस्थ रहता है।वो देवता इसलिए नहीँ कि हमने आपने उसे देवता मान लिया है।बल्कि वो देवता इसलिए है कि उसने अपने पूजे जाने की कीमत भी अदा की है।सह पाओगे इतना कुछ?दिखा पाओगे ये करूणा?तो आओ मेरा देवता बन जाओ। मैँ खोज रहाँ हुँ वो आदमी,जिसे मैँ अपना देवता बना पाऊँ।है कोई?जय हो।

Sunday, February 7, 2016

मेगा दानवीर अमिताभ बच्चन

महानायक "अमिताभ बच्चन" मेरे सबसे पसंदीदा अभिनेता हैँ,मतलब ये मुझे इतने प्रिय हैँ कि अपने बाद सबसे बड़ा हीरो मैँ इन्हीँ को मानता हुँ:-)।फिलहाल ये रसोई गैस सब्सिडी छोड़ने को लेकर श्रद्धा के ताजा उदाहरण बन छाये हुए हैँ।संयोग से मैँ दो दिन पहले इनके घर पर ही था जब इनके यहाँ परिवार मेँ आपस मेँ सब्सिडी को लेकर मंथन चल रहा था।उस पुरे मार्मिक क्षण को जो मैँने अपनी आँखोँ से देखा,आपको बताता हुँ।उस दिन बच्चन साब दोपहर ही घर लौट आये थे।आते ड्राईँग रूम मेँ ही बैठ गये और सेवक चंदु को आवाज दे एक लोटा ठंडा पानी मँगवाया।हथेली को गाल पर टिकाये सोफे पर बैठे बच्चन साब उस समय किसी गहरे सोच मेँ डुबे लग रहे थे।तब तक जया जी पानी लिये कमरे मेँ आई।बच्चन साब देखते बोले"अरे आप क्युँ लेते आईँ,उफ्फ चंदु कहाँ है?"।"वो अभिषेक के साथ खेल रहा है,अभिषेक अकेला बैठे बैठे बोर हो जाता है,मैँने चंदु को कह रखा है कि तू छोटे साब के साथ ही खेला कुदा कर,उनका मन लगा रहेगा"-जया जी ने पानी ग्लास मेँ डालते हुए कहा।बच्चन साब कुछ नहीँ बोले,पानी पी एक लंबी साँस ली और सर उठा आँखोँ को बँद कर सोफे पर पीछे की ओर अटक गये।"आप परेशान नजर आ रहे हैँ,क्या बात है?कुछ बताईये न"-जया जी ने सोफे पर खड़े होके बच्चन जी के सर पर हाथ रखते हुए पूछा।बच्चन साब ने उन्हेँ बगल मेँ बिठाते हुए कहा"अरे कुछ नहीँ,चिँता की कोई बात नहीँ।बस एक निर्णय लेना चाह रहा था,आपलोगोँ से सलाह लेना चाहता हुँ"।"क्या?"जय जी ने पूछा।"सोच रहा हुँ घर का रसोई गैस सब्सिडी छोड़ दुँ"-बच्चन साब ने जया जी के आँखोँ मेँ देखते हुए।"क्यायाया?पागल हो गये हैँ आप?"-जया जी चीखते हुए उठीँ और उनके हाथ से लग के पानी का लोटा टेबुल से लुढ़क कालिन पर गिर गया।"अरे आप सुनिये भी तो,क्या दिक्कत है,हम बाजार मूल्य पर खरीद लेँगे,बाबूजी के आशीर्वाद से इतना तो कमा ही लेता हुँ,आप भी ठीक ठाक सासंद हैँ,दिक्कत हुई तो खाना संसद कैँटिन से मँगा लिया करेँगे।"-बच्चन साब ने उठ कर जया जी की बाँह पर धीमे से हाथ रखते हुए कहा।पर जया जी का पारा गरम था,उन्होँने झल्ला कर कहा-"आप बैठ कर यही सब अनाप शनाप सोचते रहिये,मुलायम अमर की संगत तो छुट गई पर आपका समाजवाद नही उतरा है अभी"।बच्चन साब ने उन्हेँ साथ सोफे पर वापस बिठाते हुए समझाते हुए कहा-"आप समझने की कोशिश करिये,आखिर क्या हमेँ बस खुद के लिए ही सोचना चाहिए?कुछ देश के गरीबोँ की भी तो सोचिए।देखिये देश की स्वच्छता के लिए मोदी जी तक ने झाड़ु उठाया,अंबानी ने हरे पत्ते चुने और हम 300-400 रूपये नहीँ दे सकते क्या?आप सोचिए इस बड़ी रकम से लाखोँ बुझे चुल्हे वाले घर मेँ चुल्हा जल उठेगा।"।जया जी थोड़ी नरम होते हुए बोलीँ"देखिए जी आप बस देश देश सोचते हैँ।मैँ एक माँ हुँ,मेरा भी तो दिल है,मेरे लिए पहले अपना बेटा है फिर कुछ आता है।आप सोचो बेचारा प्यारू अभिषेक का क्या होगा?ना कोई फिल्म मिलती है।मिलती भी है तो चलना छोड़ो हिलती भी नहीँ है।उपर से बहु का खर्चा।एक बार कान महोत्सव घुमने जाती है तो एक पासबुक खर्च कर जाती है,गाउन,लिपिस्टिक और अभिषेक की टिकट खाना पीना और पोती के कपड़े लते की शॉपिँग का खर्च।कैसे चलेगा ये सब।कम से कम सब्सिडी का गैसा रहेगा घर मेँ तो बुरे वक्त मेँ खिचड़ी तो पका के खा पायेगा हमारा बेटा"।बच्चन साब ये सुन खड़े हो गये बेचैनी मेँ कमरे मेँ टहलने लगे।टहलते हुए वो दिवार पर टँगी "हरिवंश राय बच्चन साब" की तस्वीर के सामने खड़े हो गये।एकटक तस्वीर को देखे जा रहे थे मानो कह रहेँ होँ कि,बाबुजी अब आपही कुछ रास्ता दिखाईए।5 मिनट बाद अमिताभ वापस सोफे पर आ बैठे और बोले-"देखिये आप बात ठीक कह रही हैँ।पर ये भी तो देखिये कि अब बहु भी फिर से कमाने लगी है,इनकी फिल्म जज्बा आ रही है।कल इरफान भी बता रहे थे कि फिल्म हिट जानी चाहिए।सो एक बार प्लीज आप सोच के देखिए,हमने कई लोगोँ से कह भी दिया है कि मैँ सब्सिडी छोड़ रहा हुँ।सम्मान फँसा हुआ है और बाबूजी कहते थे कि बिना सम्मान भला कैसा जीवन"।पर जया जी कहाँ समझने वाली,फिर गरजी-"ये बाबुजी आपको कुछ घर द्वार के बारे मेँ समझा के नहीँ गए न?देख लिजिए जी जाईये ठीक है छोड़ दीजिए सब्सिडी पर एक शर्त है।सब्सिडी केवल आपके कार्ड पर छुटेगा।मेरा,बहु और अभिषेक के कनेक्शन पर नहीँ।और दुसरी कि ये लास्ट बात मानी तुम्हारी।अब आगे अभिषेक वाली मनरेगा कार्ड छोड़ने और ऐश्वर्या को किशोरी कौशल योजना का लाभ लेने भी छोड़ने मत कह देना"।"मंजुर देवी जी मंजुर,चलो नहीँ कहुँगा ये सब"-बच्चन साब ने सुकुन से हँसते हुए कहा।इतना कहते ऐश्वर्या आ जाती हैँ।"ओ पापा यु आर ग्रेट,आज शुटिँग पे पता चला कि आप गैस सब्सिडी छोड़ रहे हैँ,पूरे बॉलीवुड को आप पे प्राउड है पापा,सब आपको ग्रेट कह रहे थे"-आते ही ऐश ने गले लगाते हुए कहा।"हा हा ओ थैँक्स बेटा,चलो अब जरा मीडिया को फोन लगाये और बता देँ"-कह कर बच्चन साब ने दैनिक जागरण के संजय गुप्त को फोन लगाया।खबर सुनते ही गुप्त जी की आवाज आयी"क्या कह रहे हैँ सर!इतना बड़ा फैसला।सर आप पहले इतने दानी अरबपती हैँ।सर आप महान हैँ।मोदी जी प्रेरणा का असर है ये।काश देश के सभी अरबपति आपकी तरह रसोई पर सब्सिडी छोड़ देँ तो आज हमारा देश फिर सोने की चिड़िया बन जाय।मैँ छापता हुँ तुरंत ये खबर।बड़ी खबर है।त्याग की नई मिसाल।"। इतना सुन बच्चन साब गर्व से फुले फोन काट ऐश और जया से लिपट गये।तब तक अभिषेक भी आ गये और बच्चन साब की पीठ पर चढ़ गये मारे खुशी के।पुरा परिवार भावुक था।ये भावुक सीन देख मुझसे रहा ना गया।मैँ भी आँसु लिये जा के उन सब से लिपट गया।मुझे देखते बच्चन साब ने हड़बड़ा कर चौँके और लात मार गिरा दिया।"कौन हो तुम,यहाँ कैसे आ गये"बच्चन बोले। मैँ इतना ही बोल पाया"साब जिस घर मेँ सब्सिडी,मनरेगा और किशोरी कौशल योजना आ सकती है,उस घर मेँ मुझ गरीब को देख अचरज कैसा"।सुनते ही जया जी चिल्लाई-"गार्ड बुलाओ,पीटो और बाहर फेँको इसे,इसकी जेब देखो इसने अभिषेक का मनरेगा वाला जॉब कार्ड तो नहीँ चुराया"। गार्ड दौड़े आये और मैँ सड़क पर पड़ा हुँ अभी।जय हो

पीजिये दारु..मार्क्स जो बनना है

कल कुछ युवकोँ को युँ ही एक चौराहे के पास "दारू" पीते देखा।सब सिविल की तैयारी वाले छात्र ही थे और राम की रावण पर जीत की विजयादशमी इंजॉय कर रहे थे।"दारू" पीते देखने मेँ तो कुछ अचरज वाली बात नही थी पर उनका जो अंदाज और हड़बड़ी थी पीने वक्त उसने मेरा ध्यान खिँचा।एक ने झट से बंद पड़े मेडिकल स्टोर के सामने खड़े खड़े बोतल खोला"अरे भोँसड़ी के जल्दी गिलसवा निकालो,फेर जा के पढ़ना भी है"।दुसरे ने तुरंत पॉलिथिन से चार ग्लास निकाल चुकुमूकू बैठ जमीन पर रख दिया"डालो अब जल्दी,..ऐ मनोज जी भूजिया फाड़िये न"।मनोज जी ने धड़ भुजिया फाड़ सबको एक एक मुट्ठी बाँटा और दुर खड़े अशोक को आवाज लगाई"अरे अशोक भाई आईये न फटाक पीजिए महराज,ऊंहाँ हिस्ट्री बाद मेँ पेलियेगा"।दारू ग्लास मेँ डलते सबने बिजली की गति से ग्लास उठाया और एक दुसरे से अलग मुँह घुमा के आँख मुँद एक गटके मेँ पी लिया और ग्लास इस झटके से फेँका जैसे खून का साक्ष्य मिटा दिया हो।भक्क मुँह मेँ भुजिया डाला और ये कहते हुए निकल लिये"तब अबकी यूपी लोअर मेँ गर्दा उड़ाईयेगा कि नही अशोक भाई.."।सब कुछ इतनी तेजी से घटित हुआ मानो दारू नही बल्कि चाँदनी चौक मेँ बम प्लांट करके निकले होँ चारो लौंडे।ये कैसा पीना है मित्र:-)।"दारू" आज भी इस देश का सबसे सनसनीखेज पेय पदार्थ है।पीने वालो ने इसे प्रगतिशिलता और आधुनिकता से भी जोड़ जाड़ कर इसे सहज बनाने का प्रयास किया पर फिर भी "दारू"एक सहज पेय होने मेँ नाकाम रहा।कई विचारधाराओँ ने भारत मेँ इसे अपना वैचारिक पेय बना इसे मुख्य धारा का पेय बनाना चाहा पर बेचारे वो भी असफल रहे पर हाँ उनलोगोँ ने इसके एक बौद्धिक फलक को जरूर खोला और आगे चल आज दारू एक वर्ग के लिए बौद्धिक और प्रगतिशील फैशनेबुल पेय बना जिसे पीना और खुलेआम पीना आपको अच्छा फील कराता है।आपको जड़ परंपरा से मुक्ति वाला अहसास देता है।ये वर्ग जब फेसबुक पर दारू पीते हुए पोस्ट लगाता है तो वो महसुस करता है कि लो ये है मेरी आजादी,लो मैँने तुम्हारी सड़ी गड़ी वैदिक,पौराणिक सोच और जीवनशैली को "दारू"मेँ डुबा गला दिया।पर असल मेँ "दारू"कोनो इस या हमरे बाप की पीढ़ी की खोज थोड़े है जी।वैदिक काल मेँ दारू के दिवाने देवता"मुंजवत पर्वत बीयर बार"जा के सोमरस पीते थे।बिँबिसार ने दारू पी के कई दुश्मन दाब के मार दिया।फिर बुद्ध ने अंतिम समय दारू पिया।अशोक ने कलिँग के गम मेँ पिया और अहिँसक हो गये।अलाउद्दीन ने अपनी बाजार नीति मेँ बकायदा सैनिकोँ को सरकारी ठेके पर रियायती दारू पिलवाया।अकबर पी के रात भर तानसेन को गवाते और बीरबल से कुलेली करते।बाजीराव मस्तानी संग पी के युद्ध के साथ साथ रोमांस के भी शिखर पर पहुँचे।अंग्रेजो को दारू पिला पिला सिँधिया,होल्कर,गायकवाड और भोँसले ने अपना राज बचाया।गाँधी जी द अफ्रीका मेँ नस्लभेदी तनाव दारू पी के ही झेले।नेहरू जी ने माउंटबेँटन और एडविना के साथ दारू पी के ही कैबिनेट मिशन को साईड करवा भारत पाक बँटवारे के साफ मसौदे वाला फार्मुला तैयार करवा 15 अगस्त की आजादी सुनिश्चित की।ये अटल जी के दारू पीने के कारण ही आई हिम्मत थी कि अमेरिकी प्रतिबंधो को हटा सावन की घटा बताते हुए "परमाणु परीक्षण" किया और दुनिया हिला दी।अब हमारी पीढ़ी को लगता है कि "दारू"तो बस उनका फैशन है:-)।लेकिन प्राचीन काल से आज तक के गौरवमयी इतिहास के बावजूद दारू एक सर्वमान्य सहज पेय बनने मेँ नाकाम रहा।इसको एक वर्ग या तो बुरा व्यसन समझता है या कोई वर्ग प्रगतिशीलता का पेय पर है ये सनसनी ही।आप इसे या तो छुप के पीते हैँ या तो ऐसे दिखा के कि ये देखो मैँ दारू पीता हुँ,है तुम मेँ इतनी आधुनिक सोच।पर आप अभी भी दारू को कभी लस्सी या शर्बत की तरह पीने की औकात नही पैदा कर पाये।असल मेँ दारू क्या करे।जैसे पानी मेँ जो रंग डालिए उस रंग का हो जाता है वैसे दारू मेँ जो चरित्र घुलता है दारू उस रंग का हो जाता है बेचारा।जब ये दारू किसी रिक्शे वाले के पेट जाता है तो आपस मेँ गाली गलौज माथा फोड़वा देता है।जब ये हरिवंश बच्चन जी की कलम मेँ बहता है तो "मधुशाला" लिख देता है।किसी नेता के मुँह लगता है तो लोकतंत्र के कोठे पर कोई ममता कुलकर्णी रात भर नाचती है।यही दारू जब किसी शायर के दिमाग मेँ घुलता है तो लिखा जाता है"तू हिँदु बनेगा न मुसलमान बनेगा,इंसान की औलाद है इंसान बनेगा"।यही जब नरेंद्र चंचल के कंठ उतरता है तो माता के जयकारे से दुनिया गुँज जाती है और यही जब बसंत विहार के किसी चलती हुई बस मेँ कुछ हरामियोँ के रगो मेँ बहता है तो इंसानियत शर्मसार हो जाती है।दारू कुछ नहीँ।आप तय किजिये की आप कैसे हैँ।छुप के गीदड़ टाईप और खुल के लुच्चा टाईप पीना छोड़िये।पीते हैँ तो सहज हो पीजिए या मेरी तरह पीते देखिये खुशी खुशी।और जीवन मेँ एक सुझाव जरूर ध्यान रखना कि कभी किसी पीने वाले को दारू छोड़ने की सलाह मत देना:-)दुनिया मेँ इससे बड़ी बेवकूफी कोई नहीँ।दारू पीने वाला यमराज के भैँस पर भी बैठ बोतल खोल पी लेगा,वो आपकी क्या सुनेगा।खैर,आप दारू पी के भी नेहरू नहीँ हो सकते और ना दारू से दूर रह दयानंद सरस्वती।अच्छा तो गाँजा पी के भी अच्छा है और कुकर्मी शर्बत पी के भी कांड कर सकता है।रही बात बड़े बुजुर्गोँ के "दारू" को गंदा पेय मानने के भ्रांति की तो इस पर बस यही कहना चाहुँगा कि बड़े बुढ़ोँ को बकने दीजिए,अजी दारू चरित्र थोड़े खराब करता है,ये तो बस किडनी और लीवर खराब करता है:-)।ये तो डॉक्टर ठीक कर देगा।है न:-)।पर ध्यान रहे,जिनका ठीक ना हो पाया,वो पहले किडनी से जाईयेगा,फिर दुनिया से जाईयेगा।पत्नी छाती पीट लाश पर रोयेगी।बच्चे बिलखेगेँ।आप तो चल दिये पी के तिलहंडेपुर।अब रह गया परिवार जिँदगी को घसीट घसीट ढोने को।कमाये कौन और खाये कौन।बस कई बार कई परिवार ऐसे ही गड़बड़ा जाता है न चचा:-)।सो पीजिए।कुबेर टाईप लोग पियेँ,उनका तो सँभल जायेगा।आय से छोटे मँझोले पर सोच और बौद्धिकता मेँ बड़े लोग थोड़ा सँभल के पियेँ।ध्यान रखेँ आपका जीवन परिवार खातिर अनमोल है और मरने के कई खतरे रोज खुद हैँ सर पे।बाकि दारू अच्छी चीज है।पीजिए न,हमको का।जय हो।

शाही स्नान

"शाही स्नान":-)महराज ई भी कोई शाही स्नान है।ये हजार की संख्या मेँ हाथ मेँ डमरू त्रिशुल लिये एक साथ नंगा पुँगा हुए देह मेँ कादो कीचड़ भूत भभूत घसे एक दुसरे पर चढ़े ठेलम ठेली हुरकुच्चा हुरकुच्ची किये अघोरियोँ का चिचियाते हुए पानी मेँ डुबकी लगाना और फिर पुनः भूत भभुत मले निकल लेना, ये आपको "शाही स्नान" दिखता है?पोखरा मेँ भैँस भी ऐसहीँ त नहाता है। साहब "शाही स्नान" देखना है तो आईये कभी किसी गाँव मेँ और देखिये नयका नयका ससुराल आये "पाहुन" यानि "दामाद" mean "जीजा" का स्नान:-)।सुबह होते पाहुन को तकिया के पास ही ठीक कान से सटे गिलास भर गर्म चाय रख राजकीय सम्मान के साथ जगाया जाता है।चाय पीने के बाद पाहुन देह हाथ ऐँठते खटिया से उठते हैँ और मँझले साले की तरफ देख हल्का मुस्कुराते हैँ कि साला झट गमझा के नीचे खैनी रट ऐसे सफाई से खैनी जीजा तक पहुँचा देता है जैसे पलक झपकते सर्बिया के रिफ्युजी हंगरी पहुँचा दिये जाते हैँ।अब शुरू होती है पाहुन यानि जीजा की शाही स्नान यात्रा:-)।तीन साले पाहुन को स्कॉट करते हुए कुँआ की तरफ निकलते हैँ।छोटका बंटु बाल्टी लोटा और सरसोँ तेल ले के लेके आगे आगे चलता है,सबसे छोटका संटुआ गमझा,लुँगी,कटोरी मेँ दुध बेसन और नीँबु का लेप,सिँथॉल साबुन लिये चल रहा होता है।एक साला खैनी रटाते खिलाते और मोबाईल पर भरत शर्मा ब्यास का गाना फूल साउंड मेँ सुनवाते हुए एकदम साथ साथ चलता है।कुआँ पर पहुँचते ही पाहुन अपनी गंजी लुँगी खोल हवा मेँ उछालते हैँ जिसे लपक कर मँझला साला कैच करता है।तब तक बंटु कुँऐँ से एक बाल्टी पानी निकाल मुंडेर धो के वहाँ पाहुन के बैठने की जगह बना देता है।पाहुन बैठ के गाल पर बेसन घसतेँ हैँ और इधर संटुआ पीठ पर सरसोँ तेल रगड़ रहा है तब तक जीजा मँझले से कोई फिल्मी गाना का फरमाईश कर देते हैँ"अरे जरा कुमार सानु का कोनो लगा दीजिए घोल्टन जी"मँझला साला घोल्टन तुरँत पैँट की जेब से दुसरा मेमोरी कार्ड निकाल अंदाज फिल्म का गाना "आयेगा मजा बरसात का" लगा देता है।इधर बँटु बाल्टी भरे जा रहा है और संटुआ लोटा लोटा पानी डालते जाता है पाहुन पर,इतने मेँ घोल्टन जेब से क्लीनिक प्लस सैँपु का छोटा पाउच निकाल उसे फाड़ पाहुन के सर पर गिराता है।संटुआ एक छीँटा उस पर पानी का मारता है।पाहुन एकदम फेने फेन हो जाते हैँ,सारा कुँआ गमगम करने लगता है,बगल मेँ रोपे प्याज की बाड़ी मेँ भी पाहुन की खुशबु उतर जाती है कुँआ से खेत जाती नाली के रास्ते।पाहुन देह मेँ लगाने के लिए जैसे साबुन उठाते हैँ कि घोल्टन"अरे अरे आप छोड़ दीजिए न जीजा जी,संटुआ घस देगा,ऐ संटु बढ़िया से मल दो साबुन तनी"।करीब 5 मिनट फेन से खेलने के बाद अब बंटु सीधे बाल्टी बाल्टी पानी पाहुन पर डालता है।करीब दस बाल्टी के बाद"जीजा जी कैसन लग रहा है,फरेश हुए कि नहीँ":-)।"हाँ एकदम टनटन हो गया हो,लाईए गमझा जरा"।सुनते संटुआ गमझा देता है,फिर पाहुन लुँगी गँजी बदलते हैँ।घोल्टन कहता है"अरे संटुआ,तूम लोग जीजा के लुँगी जंघिया खंगार धो के आव,हम इनको ले के जाते हैँ,ढेर धूप हो रहा है"।पाहुन फरेश हो पुनः ससुराल गेँदा फूल की तरफ बढ़ते हैँ।गुरू ई हुआ ना"शाही स्नान":-)भइया हम गाँव के लोग हैँ,इतनी ही दुनिया देखी है और जितनी देखी है उसमेँ"जीजा के स्नान" से ज्यादा "शाही स्नान" हमने तो नहीँ देखा।क्षमा करियेगा।जय हो।।

विश्व पुस्तक मेला

"विश्व पुस्तक मेला"..मेला मेँ जाईए और चुपचाप कोई कोना पकड़ आधा एक घंटा शांति से खड़ा हो पहले मेला देख लिजिए तब अपने काम मेँ लगिए।हॉल के अंदर घुस कोना पकड़ा ही था कि देखा एक नारंगी रेशमी धोती पहने धर्म विक्रेता अपने सतगुरू की लिखी किताब और सीडी लिए एक सज्जन को पकड़े पेल रहे हैँ"ये विज्ञान ने देश का कबाड़ा कर दिया,ये ईश्वर को नकारता है और पाप को बढ़ावा देता है।पश्चिमीकरण के कारण आज वेद और पुराण के चमत्कार को पीछे धकेल ये नकली लोग विज्ञान लेके आ गये हैँ।आप अपनी दिव्य परंपरा को फिर से जीवित कर भारत को विश्व गुरू बनाना चाहते हैँ तो ये किताब और ये सीडी लिजिए।आईए दो मिनट टीवी स्क्रीन पर उनकी अमृत वाणी सुन जाईए,चित्त को बड़ा आराम मिलेगा"।मैँ पीछे खड़ा था।बबवा का अमृत वचन कान मेँ तो अमृत की तरह गया पर जहर बन मेरे मुँह से निकला"अच्छा गुरू जी ये बताईयेगा जरा सा कि ये सीडी आपके गुरूजी के ज्ञान से बना है और ये टीवी स्क्रीन गुरूजी के ज्ञान से बना कि नकली पापी विज्ञान से?"इतना सुनना था कि वो बिना भड़के एक छेछड़ी मंद मुस्कान के साथ बोला"श्रीमान आप आगे निकल लेँ,मार्क्सवाद और कम्युनिज्म आगे के काउंटर पर बिक रहा।आपकी पसंद की चीजेँ वहाँ मिलेँगी।आप वहाँ चले जाईये।हमेँ अपनी बेचने दीजिए"।उसके इस शानदार बयान को स्वीकार कर आगे बड़ा था कि देखा एक काउंटर पर एक अधपके उम्र का आदमी एक हाथ मेँ चाय लिए बड़े कर्तव्य भाव से बाबा अंबेडकर पर लिखी किसी पुस्तक के पन्ने पलट रहे थे कि अचानक उन्हेँ किसी ने पीछे से धक्का दिया और वो अकबका के उछले और गर्म चाय उनके हाथ से टघरते टघरते पैँट होती हुई ऐँड़ी तक चली गई।वो बड़े सौम्य तरीके से चिचियाते झल्लाते हुए पीछे की तरफ ये बोलते हुए मुड़े"ओ सीट!किस मनुपुत्र ने धक्का मार जला दिया यार"।पीछे मुड़े तो अवाक् रह गये।ये उनका 10 वर्ष का बेटा था जो अपने बाप की बौद्धिक सनक का शिकार हो 6 घँटे से बाप के पीछे स्टॉल दर स्टॉल घुम रहा बच्चा था जो अब बाहर निकल कुछ खाना पीना चाहता था।"पापा अब चलो न भुख लगी है।कितनी देर रहोगे और।चलो न चलो न प्लीईईज पाअपा"।मुझे पहली बार समझ आया कि हर बार आदमी मनुपुत्र के हाथ ही नही जलता,कभी कभी अपना पुत्र भी जला देता है।थोड़ी देर मेँ देखा एक स्टॉल पर एक सज्जन बड़ी गंभीरता से किताबेँ छाँट रहे थे।उन्होँने पहले अब्दुल कलाम साब की अग्नि की उड़ान उठाई।फिर अमृत्य सेन की किताब,फिर नंदन नीलकेणी की,फिर एक किताब शशि थरूर की,आगे अंग्रेजी डेस्क पे गये और सलमान रूश्दी और अमिताभ घोष की दो किताबेँ उठाईँ।मैँ समझ गया आदमी तराशा हुआ बुद्धिजीवि है।सज्जन फिर सारी किताब रख वापस हिँदी डेस्क पर आये और आखिर मेँ एक किताब उठा कर बिल काउंटर पर रख दिया।मैँने जिज्ञासावश उछल कर झाँका कि आखिर इतना चमकीला बुद्धिजीवी क्या पढ़ता है देखुँ।किताब का नाम था"असाध्य रोग एवँ उसका निदान @लेखक हकीम तूफानी,डायमंड प्रकाशन।मैँ हक्का बक्का।तब जाना कि आदमी ऊपर से कितना भी टीप टॉप हो पर अंदर से बड़ा बीमार है।एक स्टॉल पर एक 75-76 के बुजुर्ग को देखा जो शायद किसी के सहारे लाये गये थे पर ज्ञान बटोरने की धीमी गति के कारण अकेले अपने भरोसे किताब खोजने छोड़ दिये गये थे।उन्हेँ अपने चश्मे सहित अलग से अतिरिक्त लेंस लिए पुस्तक खोजते देखा।उन्होँने पहले हास्य व्यँग्य की पुस्तक उठाई पर देख रख दिया।शायद ये सोच के कि बुढ़ापा अपने आप मेँ एक व्यँग्य है जिँदगी का।फिर उन्होँने ये सोच की बुढ़ापा आखिरी बचपन होता है उन्होँने एक बाल साहित्य उठाया।पर कुछ देर मेँ उसे भी रख दिया।अंत मेँ उन्होँने जो किताब फाईनल कर खरीदी उसे देख खोपड़ी घुम गई।किताब का नाम था"सक्सेस सीक्रेट"।अब तक सोच रहा हुँ कि उम्र के आखिरी पड़ाव पर उस बुढ़े बाबा को ऐसी कौन सी गुप्त विद्या चाहिए और कौन सी सफलता के लिए।ये बुढ़ापे का नहीँ जीवन का चरित्र है,साला जब तक रहेगा तब तक कुछ ना कुछ चाहिए।सफलता नशा है,किसी भी उम्र मेँ यूँ हल्के मेँ नही उतरती।जिसकी उतर जाती है वही भारी व्यक्तित्व हो मोक्ष पा लेता है।एक बार ये भी सोचा कि बुढ़वा बड़ा जीवट है क्या,इस उम्र मेँ भी ये जतन।खैर जीवटता हो या अतिलालसा,मैँ इतने मेँ चाय पीने बाहर आ गया हुँ।मैँ हिँदी का लेखक,हिँदी का लेखक भले दिमाग से भले प्रेमचंद ना हो पर पेट मेँ एक निराला लिये घुमता है।जी हाँ पेट मेँ भूख से शिराएँ मरोड़ मारती हैँ पर कुछ खरीद खाना मुश्किल है।अंदर डेढ़ सौ रू मेँ छोला भटुरा और सौ रू मेँ राजमा चावल मिलता है।अच्छा था निराला कि आपके समय मेँ कोई विश्व पुस्तक मेला ना था और न कोई प्रगति मैदान ही था..वर्ना जान लिजिए आप किसी मेले मेँ ही भुखे मरते।किसी अज्ञेय से असाध्य वीणा तो साधी जा सकती है पर बाजार को भेदना मुश्किल है।फिर हम हिँदी वाले लड़ रहे हैँ..कोशिश और संघर्ष जारी है।कल आखिरी दिन है।जाईये मेला घुम आईये।जय हो।

खुदखिंचन पद्धति ....सेल्फी

अक्सर आप पर्यटन स्थलोँ जैसे इंडिया गेट या ताजमहल कहीँ भी पर्यटकोँ को फोटो खिँचवा लेने के लिए कहते उनके आगे पीछे दौड़ते,उन्हेँ मनाते रिझाते फोटोग्राफरोँ को देखते होँगे।एक जमाना था जब इन फोटोग्राफरोँ का धंधा खुब चौकस और हिट था।पर समय बदला और जब से स्मार्ट फोन बाजार मेँ आये इन कैमरोँ के दिन लद गये और अब बड़ी मुश्किल से पेट चला पाते हैँ ये फोटोग्राफर लोग।मोबाईल से पहले के जमाने मेँ यही फोटोग्राफर थे जो हर पर्यटक की सैर को यादगार बनाते थे।मात्र आधे घंटे मेँ जब ये फोटोग्राफर आपको ताजमहल के साथ खड़ा कर फोटो मेँ उतार हाथ मेँ लिफाफा थमाते तो पैसा दे आदमी लिफाफा खोल पहले मिनटोँ खड़ा फोटो निहारता था फिर मुस्किया के बैग का चेन खोल उसके भीतरी खोल मेँ डाल लेता था फोटो।तब मुझे याद है कि गाँव से लेकर कस्बोँ और शहरोँ तक स्टूडियो का एक खास जलवा था।फोटो खिँचाने का एक कायदा होता था जिसे फोटोग्राफर लागु करता और खिँचाने वाले माननीय न्यायालय के आदेश की तरह मानते।वो जब हुँमायू के मकबरे पर खड़े गाँव से आये जोड़े को एक दुजे का कमर पकड़ने कहता तो कभी खुलेआम हाथ ना पकड़ने वाले जोड़े भी बेहिचक कमर पकड़ते।फिर वो कहता"जरा हँसिये।हाथ उपर करिये।पैर पीछे करिये।गर्दन दायेँ थोड़ा।इधर देखिये।मैडम आप भी हँसिये।आप भाई साब के कंधे पर रखिये हाथ।थोड़ा देखिये ईधर!" तो अभी अभी खरीदारी के वक्त हुए आपसी झगड़े के बाद तनाव के बाद भी वो जोड़ा हँसता था और फोटोग्राफर दोनोँ को करीब ला देता था।ये फोटोग्राफर ही थे जिन्होँने फोटो खिँचने का वो एंगल खोज निकाला था एक सिक्की से पतले आदमी के हथेली पर ताजमहल खड़ा हो जाता था,इंडिया गेट गढ़ जाता था।हर चीज को मुट्ठी मेँ बँद कर लेना,कदमोँ मेँ ले आना ये इंसान की शाश्वत इच्छा रही है..रावण से लेकर गाँव के प्रधान तक सब हथेली मेँ संसार चाहते हैँ।फोटोग्राफरोँ ने ही इस इच्छा को एक फ्रेम दिया और हर इंसान की दमित इच्छा को उकेर उसके हाथ ताजमहल तो कभी हथेली पर सूरज का एंगल दे उसके अहं को एक आत्मसंतोष दिया।दिल्ली घुमने आये मेरे गाँव के विभुती बाबू ने भी ऐसा एक फोटो संसद भवन के सामने घास पर लेट टाँग ऊपर उठा के खिँचवाया था जिसमेँ उनका लात संसद भवन के ऊपर दिख रहा था।वर्षोँ बड़े गर्व से वो फोटो दिखाते और हमसब आश्चर्य से उनका ये कमाल ऐसे देखते जैसे पाँच मुँह वाला शेषनाग देख रहे होँ।अच्छा तभी शादी ब्याह मेँ भी स्टूडियो का बड़ा महत्व था।मुझे अपने यहाँ के "केसरी स्टूडियो"मेँ जब भी कोई लड़की साड़ी पहन बायाँ हाथ नीचे किये,दाँयी हथेली बाँये के बाँह पर रखे और बगल मेँ एक लंबी टूल पर प्लास्टिक फूल का गुलदस्ता रखा फोटो खिँचवाते दिखती तो समझ जाईए ये लड़के वालोँ को पसंद के लिए जायेगा फोटो।उस वक्त फोटो खिँचाते लड़की का तनाव और वहीँ बैठे उसके पिता का तनाव बताता था कि ये UPSC के इंटरव्यु से ज्यादा नर्वस करने वाला पल होता था।पिता लगातार फोटोग्राफर से कहता"देखियेगा केसरी जी थोड़ा लंबा दिखे ई फोटो मेँ।और जरा हाथ पर वाला कटा का दाग बचा के।बढ़िया से खिँचिएगा।बहुत परेशान हैँ शादी के लिए।"।फोटोग्राफर फिर सबल देता"घबराईये नय,हमरा खिँचा रिजेक्ट नय हुआ है आजतक।बेजोड़ फोटो निकालेँगे"।मतलब तब फोटोग्राफर फोटो ही नहीँ,रिश्ते भी खिँचा करता था।मेरे गाँव था एक "माँ चंचला स्टूडियो और एक वीणा स्टूडियो"।मुझे याद है कि घर मेँ हर साल स्पेशल फरवरी मार्च के दिनोँ फोटो खिँचाने फोटोग्राफर आते।हम बच्चे छत पर जा अपने खिलौने एक चादर पर सजा देते और उसके बीच लेट फोटो खिँचाते तो कलैंडर ब्यॉय लगते:-)।फिर चलता पारिवारिक फोटो-सेशन।एक बार माँ दादी तो एक बार नानी की गोद मेँ।एक बार मौसी तो कभी बुआ के कंधे पर।ये फोटो आज भी मेरे लिए टाईम मशीन की तरह हैँ जो देखते उस उम्र मेँ पहुँचा देते हैँ।अब मोबाईल आ गया।पीछे 13 मेगापिक्सल तो आगे 8।दिया मोबाईल और फटाक खिँचा लिया,मेमोरी मेँ सेव।मोबाईल ने हर आदमी के अंदर एक विश्वसनीय फोटोग्राफर पैदा कर दिया है जो सब खीँच लेना चाहता है।जिस आदमी की मैट्रिक के पहले कोई पासपोर्ट साईज फोटो भी ना खिँचवाई थी घरवालोँ ने वो भी आज फोटोग्राफी को अपना पैशन बना चुका।ऊपर से जब से ये "खुदखिँचन पद्धति"(सेल्फी) चलन मेँ आयी है आदमी आत्मनिर्भरता के चरम दौर मेँ है।खुद का खुद खीँच रहा है।अच्छा जब रोज रोज अपना एक सा थोथना खीँच खीँच कर आदमी बोर हो रहा है तो मुँह की अजीब विचित्र भाव भंगिमा कर खीँच रहा है।कई युवतियोँ को देखा कमर को अजीब तरह लचका,होँठोँ को टेढ़वा गोल कर नाक को विचित्र तरीके से सिकुल और ऊपर के दोनोँ भँवोँ को जोड़ "खुदखिँचन"ले रही थी।हर आदमी के पास अब खीँचने का क्रेज है।मसलन कई को तो मोबाईल से ऐसा रोग लगा कि वो बकायदा कैमरा खरीद कुत्ता,बिल्ली,गिलहरी की फोटो खिँचते चलते हैँ।अब तो कैमरा खुब बिक रहा है पर फोटोग्राफर वाला युग गया जानिए।तब हम खिँचवाने के पैसे देते थे अब तो खिँचवाने के पैसे मिलते हैँ।हाँ ऐसे कई "खिँचरोगी" को मैँने सीपी और साकेत या हौज खास मेँ देखा कि गरीब के बच्चोँ पैसे दे के उन्हेँ बिठा कर फोटो खिँचते देखा।वो जितने गरीब हैँ उतने ज्यादा मोल हैँ उनके फोटो के।जितना मैला रहेँगे उतना साफ फोटो निकलता है।भुखमरी कंगाली के फोटो किसी भी अखबार या पत्रिका के लिए सबसे चमकदार फोटो साबित होते हैँ।जो जितना विभत्स है उतना दर्शनीय।थ्री इडियट के माधवन ने नई पीढ़ी को फोटोग्राफर बना दिया जिसे लगता है कि उसे रेँचो की दोस्ती मिल जायेगी।खैर आज भी बड़े फोटोग्राफर हैँ और बड़े स्टूडियो भी हैँ जो काले कमाई वाले काले आदमी के गोरे फोटो निकालते हैँ,उन्हेँ चमका के पेश करते हैँ।पर इधर मोबाईल से पैदा हुई शौकिया फोटोग्राफिक पीढ़ी ने खाने कमाने वाले छोटे मोटे फोटोग्राफरोँ का दायरा छोटा कर उनकी आय पर असर डाला है।टाँग खिँचने से लेकर फोटो खिँचने मेँ एक्सपर्ट इस पीढ़ी से उम्मीद करता हुँ अगली बार जब भी कहीँ जाईये तो एक फोटो इन कैमरे का बोझ उठाये फोटोग्राफर से जरूर खिँचवा लेना जी।जय हो।

शनिदेव- तेल का खेल, वेद पुराण फेल

हड़प्पा काल मेँ सबसे परम पद शिव को प्राप्त हुआ,वैदिक काल मेँ इंद्र देव और प्रजापति देवता का जलवा कायम रहा और फिर गुप्त काल से शुरू हो सदियोँ तक देखिए तो सबसे अधिक महत्व विष्णु और उनके अवतारोँ का रहा।पर अब जब आप 21वीँ सदी के भारत को देखिए तो पाईएगा कि,अचानक सबको पछाड़ते हुए अगर धर्म के बाजार मेँ कोइ सबसे तेजी से उछाल पाने वाला देवता हैँ तो वो "शनि देव" उभर कर आये हैँ।वैश्वीकरण और पूँजीवाद के दौर मेँ तैँतीस करोड़ देवताओँ मेँ यही एक देवता निकल के आये हैँ जिन्होँने वर्तमान काल और बाजार की नब्ज पकड़ी।जहाँ एक ओर गदा से लैस बलशाली बजरंग बली गाँव गली के चौराहे पर स्थापित एक बताशे और पुड़िया भर सिँदुर के लिए और महाकाल शिव एक बुँद गँगाजल के फेर मेँ लटपटाए रहे वहीँ शनि देव ने दुनिया के तेल और लोहा जैसे सबसे महत्वपूर्ण संसाधन को खुद से जोड़ बाजार का सबसे प्रभावशली देव होने का रूतबा पा लिया है।शनि देव ग्रहोँ मेँ न्यायधीश माने गये हैँ और जब दुनिया मेँ राग,द्वेष अपराध बढ़े,बाजारू गलाघोँट प्रतियोगिता बढ़ी और लगातार पाप दूराचार के केस बढ़ने लगे ऐसे मेँ शनि देवता के न्याय का मंदिर चल निकला।अब लोगोँ मेँ वर्षोँ की त्याग तपस्या और सद्आचरण से देवता को खुश कर फिर कृपा पाने का समय ना रहा।उन्हेँ तुरंत रिजल्ट चाहिए था।इस फार्मेट को समझते हुए शनि देव ने इस भरोसे को स्थापित किया कि वो तुरंत परिणाम देने वाले देवता हैँ और जो भक्ती और अराधना को देखकर प्रसन्न होने की प्राचीन परंपरा मेँ नहीँ बल्कि तत्काल मैटर के अनुसार तुरंत फैसला देने वाले देवता हैँ।अच्छा आज चुँकि संसार मेँ पाप बढ़ा सो लोग एक स्वभाविक नैतिक दवाब मेँ रहने लगे,जगत की इस कमजोरी को शनि देव ने पकड़ लिया।शनि समझ गये कि लोग को अब विष्णु कृष्ण टाईप सौम्य रूप से हड़काना मुश्किल होगा इसलिए उन्होँने अपनी एक आक्रामक छवि गढ़ी।वे समझ गये थे कि इस पापी और खुनी होती दुनिया को रामचरितमानस के चौपाई से नहीँ बल्कि भय से ही कंट्रोल किया जा सकता है।उन्होँने अपनी दो भोकाली कथाएँ भी बाजार मेँ चलवाईँ जिसमेँ उनका प्रचार हुआ कि शनि तो शंकर भगवान जैसे देव और रावण जैसे बलशाली को ना छोड़े थे,फिर तुच्छ मानव क्या चीज।अपने माहौल के अनुरूप उन्होँने खुद का गेट-अप भी खतरनाक बनाया। काली काया एवं काली मुँछ रखी, काला कपड़ा पहना,काले कौऐ को वाहन बनाया।अपने मंदिर का रूप रंग बदला।आप शनि मंदिर जाईए तो लगेगा जैसे किसी सैन्य शत्ति का खुफिया कैँप है।चारोँ तरफ काला ग्रेनाईट,काले झंडे और काला कपड़ा पहने कमांडो जैसा एक पंडा जो खैरियत की राईफल नहीँ रखता है।पर मिजाज मेँ इनका पंडा अन्य सनातनी पंडो से इतर बड़ा तपाकी और अक्खड़ जैसा करेगा।कभी बिना माँगे आशीर्वाद दे देगा तो कभी माँगने पर भी गरिया देगा।कभी बेमतलब हँस के माथे पर काला तिल छिटक देगा,गाल पर तेल घस देगा तो कभी मनहुस की तरह आँख तरेर कर देखेगा।मतलब ये पंडा बिलकुल अलग ट्रेनिँग पाये हैँ जो शनि के अक्खड़ और आक्रामक छवि का प्रतिनिधित्व करते दिखाई देते हैँ।अच्छा शनि देव ने अपनी पूजा मेँ पारंपरिक शैली को एकदम त्याग एक नया प्रारूप तैयार करवाया जो मध्य वर्ग के मिजाज को सूट करे।उन्होँने गणेश जी तरह मेवा और लड्डु जैसे घनघोर आउट डेटेट आईटम को हटा प्रसाद को नमकीन और तेलीय फ्लेवर दिया जो बाद मेँ उपयोग भी किया जा सके और उससे कुछ आर्थिक लाभ हो जिससे मंदिर की विधि व्यवस्था का खर्च चल सके।उनको सरसोँ का तेल चढ़ाया जाता है जो बाद मेँ हल्दीराम भुजिया वाले को बेचा जा सके।क्या पता कि कोई स्वदेशी कंपनी इनके तेल से तैयार"नवग्रह शांति भुजिया" बना बाजार मेँ उतार दे।आज शनि देव के पास तेल है,लोहा है,काला तिल का पहाड़ है,कपड़े का गोदाम है।मतलब केला और पेड़ा से अलग इनके पास वो टिकाऊ सामान है जिसे बाजार मेँ पुनः बेचा जा सके।शनि देव ने प्रसार के लिहाज से भी बजरंग बली के औसत को पीछे छोड़ दिया है।जहाँ बजरंगबली जैसे देवता गाँव देहात मेँ ओझरा के रह गये, शनिदेव ने बाजार की ताकत समझते हुए शहरोँ को अपना ठिकाना बनाया।वो जान गये कि जहाँ स्वार्थ है,सब पाने की बेचैनी है वहीँ अपना सिक्का जमेगा।इनके शहर मेँ बड़े मंदिरोँ के अलावा मोबाईल मंदिर भी चलते हैँ जो शनिवार के दिन हर लाल बत्ती पर लगाये जाते हैँ।चुँकि ये नये देवता हैँ सो ये खुद आम जन तक पहुँच अभी अपनी जड़ जमा रहे हैँ।इन्होँने एक लोकतांत्रिक माहौल दिया है धर्म के बाजार को।ये एक भिखारी को भी अचानक करोड़पति होने का भरोसा देते हैँ।कुंडली बाजार मेँ भी केवल शनि का जलवा है।जिस पंडित को पूछिए शनि का उपाय बतायेगा।अच्छा शनि देव ने भारतीय समाज के पुरातन मनोविज्ञान को समझते हुए तत्काल महिला द्वारा खुद को छुने पर पाबंदी रखी है।पर शनि का क्रेज देखिये कि धर्म और कर्मकांड मेँ विश्वास ना करने वाली प्रगतिशील पीढ़ी की एक युवती ने शिँगा मंदिर मेँ शनि देव पर तेल चढ़ा उनका श्रद्धा से मसाज करने का आंदोलन कर रखा है।ये दिवानगी तो सन्नी देओल और सलमान खान को भी कभी ना नसीब हुई।वैसे शनि देव आधुनिक समझदारी के देव हैँ।उम्मीद है बाजार मेँ महिला शक्ति के महत्व को देखते हुए वो जरूर नियम मेँ कुछ ढील देँगे और पुरूष संग महिलाएँ भी शनि देव के आँगन चिपचिपे श्रद्धा मेँ सने तेल तेल खेल पायेँगी।कुछ भी हो,शनि देव ने स्वर्ग मेँ लेटे अप्सराओँ का नृत्य देखते देवता और उनके सामंती और राजसी ढाँचे को तोड़ इसे चौक चौराहे और अंतिम आदमी तक पहुँचा दिया है।एक तीन चक्के की रेड़ी पर लोहे का एक पत्तर ले उसमेँ कटोरी भर तेल डाल ये चलता फिरता मंदिर आपको किसी भी रास्ते दिख जायेगा।इनका पंडा कोई तिलकधारी या टिक्कीधारी नहीँ,बल्कि किसी भी जात का सड़क का कोई भी आम आदमी हो सकता है।एक ग्रह से खुद को आगे ला अपने बलबुते और बेजोड़ प्रबंधन से देव मेँ बदल लेने शनिदेव की जीवटता को मेरा प्रणाम।असली मनुवाद तो यहाँ टूटा है मर्दे।जय शनिदेव।जय हो।